June 28, 2026 11:10 pm

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​डर से परे आस्था का सैलाब: छत्तीसगढ़ का वह मंदिर जहाँ इंसान नहीं, जंगली भालू हैं नियमित भक्त

रामवन में रोज शाम होती है भालुओं की ‘प्रसाद सभा’, सीताराम बाबा के प्यार का कायल है पूरा जंगल

छत्तीसगढ़ के मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (MCB) जिले के जनकपुर स्थित ग्राम पंचायत उचेहरा का राजामाड़ा (रामवन) क्षेत्र इन दिनों कौतूहल और चर्चा का केंद्र बना हुआ है। धार्मिक आस्था और प्रकृति के मिलन के इस स्थल पर रोजाना जो घटता है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। यहाँ शाम ढलते ही जंगल से एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों जंगली भालू आरती में शामिल होने और प्रसाद ग्रहण करने पहुँचते हैं।

आरती की घंटी और भालुओं की आहट

​स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, यह अद्भुत सिलसिला वर्ष 2013 से अनवरत जारी है। जैसे ही मंदिर में आरती शुरू होती है और घंटियों की ध्वनि जंगल में गूंजती है, भालू शांत भाव से जंगल से निकलकर कुटी परिसर की ओर चल देते हैं। प्रसाद ग्रहण करने के बाद ये जंगली जीव बिना किसी उपद्रव के वापस अपने प्राकृतिक आवास में लौट जाते हैं। हाल ही में इस स्थल का अवलोकन करने पहुंची एक टीम ने भी इस दृश्य को अपनी आँखों से देखा, जहाँ एक दर्जन से अधिक भालुओं ने बाबा के हाथों से प्रसाद ग्रहण किया।

क्या कहते हैं सीताराम बाबा?

​कुटी में निवासरत सीताराम बाबा के अनुसार, वे वर्ष 2013 में माहोरा पहाड़ से यहाँ आए थे। बाबा बताते हैं कि उनके यहाँ आने के कुछ समय बाद ही भालुओं का यह क्रम शुरू हुआ, जो आज एक दैनिक दिनचर्या बन चुका है। ग्रामीण इसे बाबा की दिव्य कृपा और चमत्कार मानते हैं।

​जब बाबा से पूछा गया कि क्या उन्हें इतने हिंसक जानवरों के बीच डर नहीं लगता, तो उन्होंने अत्यंत भावुक और आध्यात्मिक जवाब दिया। बाबा कहते हैं, “ये भालू नहीं, ये ‘जामवंत’ हैं। यदि आप इन्हें प्यार देंगे, तो ये भी आपको प्यार देंगे। मुझे जंगली भालुओं से नहीं, बल्कि इंसानों से डर लगता है।”

आस्था और कौतूहल का संगम

​जंगल के इन जंगली भालुओं का एक धार्मिक स्थल पर नियमित रूप से प्रसाद ग्रहण करना लोगों के लिए आकर्षण का बड़ा विषय है। दूर-दराज से लोग इस अद्भुत नजारे को देखने पहुँचते हैं। जहाँ कुछ लोग इसे ईश्वर की माया और आस्था का प्रतीक मानते हैं, वहीं वन्यजीव विशेषज्ञ इसे वर्षों से विकसित हुई एक स्वाभाविक आदत और मनुष्य-जानवर के बीच गहरे विश्वास का परिणाम देखते हैं।

​कारण चाहे जो भी हो, राजामाड़ा का यह ‘रामवन’ आज मनुष्य और प्रकृति के बीच के उस अटूट रिश्ते को बयां कर रहा है, जो डर से ऊपर उठकर प्रेम और विश्वास की बुनियाद पर टिका है।

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Author: News Spashat CG