राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों के सपनों का ‘अधूरा स्मारक’: कागजों में घर पूर्ण, धरातल पर मलबे का ढेर
धरमजयगढ़/कदमढोढ़ी: सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और सुशासन के दावों के बीच धरमजयगढ़ जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत कदमढोढ़ी से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो व्यवस्था की संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार की परतें खोल रहा है। यहां राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले विशेष संरक्षित ‘पहाड़ी कोरवा’ समुदाय के चार परिवार न्याय की आस में भटक रहे हैं, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में उनके आशियाने दो साल पहले ही ‘पूर्ण’ हो चुके हैं।
क्या है पूरा मामला?
ग्राम पंचायत कदमढोढ़ी के जोंकपानी मोहल्ले के निवासी सिंघूराम कोरवा, नान्ही कोरवा, जयप्रकाश कोरवा और पंडरू कोरवा ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उनके घरों का निर्माण कभी हुआ ही नहीं। आरोप है कि पंचायत सचिव के भाई श्रवण पटेल ने खुद को ठेकेदार बताकर इन गरीब परिवारों का भरोसा जीता और योजना की पूरी राशि अपने खाते में ले ली। यहां तक कि पासबुक भी अपने कब्जे में ले ली, लेकिन घर नहीं बनाया। हैरानी की बात यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में 23 फरवरी 2024 को ही इन आवासों को ‘पूर्ण’ घोषित कर दिया गया।
जांच के नाम पर बदली कहानी, उठे सवाल
मामला सुर्खियों में आते ही जनपद पंचायत सीईओ मदनलाल साहू ने मौके पर पहुंचकर जांच की। लेकिन, जांच के दौरान जो घटनाक्रम हुआ, उसने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया। ग्रामीणों का आरोप है कि जांच से पहले हितग्राहियों को डराया-धमकाया गया। दबाव का असर ऐसा रहा कि जो हितग्राही पहले घर न बनने की शिकायत कर रहे थे, वे अधिकारियों के सामने यह बयान देते पाए गए कि “मकान बना था, लेकिन तेज हवा में उसकी छत उड़ गई।”
जमीन पर खामोशी, फाइलों में ‘पक्का घर’
इस बयान ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं:
यदि मकान पूर्ण था, तो उसकी नींव और दीवारों के अवशेष क्यों नहीं दिख रहे?
प्रधानमंत्री आवास की छत क्या इतनी कमजोर होती है कि हवा में उड़ जाए?
यदि पहली शिकायत गलत थी, तो हितग्राहियों ने इतने गंभीर आरोप क्यों लगाए थे?
जांच का मुख्य उद्देश्य सच्चाई का पता लगाना था या हितग्राही के बयान को केवल ‘रिकॉर्ड’ करना?
न्याय की आस में ठगा हुआ महसूस कर रहा समाज
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन यदि वाकई गंभीर होता, तो केवल बयानों पर निर्भर रहने के बजाय निर्माण के भौतिक सत्यापन, बैंक ट्रांजेक्शन और दस्तावेज की गहन पड़ताल करता। जोंकपानी की इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब गरीब की आवाज सरकारी तंत्र के दबाव के आगे दम तोड़ देगी?
फिलहाल, कागजों में ‘पूर्ण’ हो चुके ये घर आज भी जोंकपानी के उस सच को बयां कर रहे हैं, जो अधूरी दीवारों और मलबे के रूप में जमीन पर पड़ा है। क्या प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या यह मामला भी फाइलों के बोझ तले दबकर रह जाएगा? यह आने वाला समय ही बताएगा।





