June 10, 2026 6:48 am

ट्रेंडिंग स्टोरी
Advertisement

औद्योगिक तानाशाही नहीं चलेगी! कलेक्ट्रेट में गूंजा ग्रामीणों का नारा—”जान दे देंगे, जमीन नहीं।”

रायगढ़: रायगढ़ की धरती इन दिनों एक बार फिर ‘जल-जंगल-जमीन’ के हक की लड़ाई से गूंज रही है। कोयला खनन के खिलाफ लंबे समय से सुलग रही नाराजगी अब एक बड़े जन-आंदोलन में तब्दील होती दिख रही है। 1 जून 2026 को कलेक्ट्रेट में उमड़ा ग्रामीणों का सैलाब इस बात का सबूत है कि अब आदिवासी समाज अपनी जमीन और अस्तित्व की रक्षा के लिए आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

​कलेक्ट्रेट में गूंजा संकल्प: “अपनी जमीन, अपना अधिकार”

​सोमवार को रायगढ़ जिला मुख्यालय का नजारा कुछ अलग था। पेलमा, उरबा, हिंझर, लालपुर और मीलूपारा के ग्रामीण जब कलेक्ट्रेट पहुंचे, तो उनके हाथों में बैनर से ज्यादा अपने पुरखों की जमीन को बचाने का संकल्प था। ग्रामीणों ने प्रशासन को साफ कर दिया कि 8 जून को होने वाली जनसुनवाई को वे महज एक औपचारिकता मानकर खारिज करते हैं।

​महिलाएं बनीं आंदोलन की ‘शक्ति’

​इस पूरे प्रदर्शन में महिलाओं की अग्रिम भूमिका ने प्रशासन को सोचने पर मजबूर कर दिया है। कृषि और गृहस्थी के काम को छोड़कर आई महिलाओं का कहना है, “हमारा जंगल हमारी रसोई है, हमारी जमीन हमारा बैंक। अगर यह छिन गया, तो आने वाली पीढ़ी के लिए क्या बचेगा?” महिलाओं का यह जज्बा पूरे आंदोलन को एक नई धार दे रहा है।

​राजनीतिक मंचों का मिला साथ

​आंदोलन को केवल ग्रामीणों का ही नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक और सामाजिक मंचों का भी समर्थन मिला है।

  • गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के जिलाध्यक्ष शौकी लाल नेताम ने इसे आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला बताया।
  • पूर्व विधायक हृदय राम राठिया ने तीखे तेवर अपनाते हुए कहा कि अब दमनकारी नीतियों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।
  • जनपद सदस्य संत राम खूंटे ने सरकार को चेताया कि यह आंदोलन अब गांवों तक सीमित नहीं रहेगा।

​प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती

​ग्रामीणों ने प्रशासन के समक्ष दो टूक बात रखी है:

“जनसुनवाई का मतलब जनता की राय होती है, न कि कागजी कोरम पूरा करना। अगर ग्रामीणों की सहमति के बिना कोयला खनन परियोजना को जबरन थोपा गया, तो इसके परिणाम गंभीर होंगे।”

 

प्रमुख मांगे:

  • ​8 जून की जनसुनवाई को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए।
  • ​प्रभावित गांवों की उपजाऊ कृषि भूमि और जंगलों को कॉर्पोरेट घरानों को सौंपने की प्रक्रिया बंद हो।

निष्कर्ष:

रायगढ़ का यह ‘माटी बचाओ’ आंदोलन अब एक बड़ा रूप लेता जा रहा है। एक तरफ औद्योगिक विकास की ललक है, तो दूसरी तरफ अपने अस्तित्व को बचाने का संघर्ष। 8 जून की तारीख अब केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक ‘अग्निपरीक्षा’ बन गई है। प्रशासन इस जन-दबाव को कैसे संभालता है, यह देखने वाली बात होगी।

News Spashat CG
Author: News Spashat CG

ताज़ा समाचार
Advertisement
Trending Story