अंबिकापुर (मैनपाट)।
एक तरफ देश बुलेट ट्रेन, 5G कनेक्टिविटी और डिजिटल बैंकिंग के दौर में छलांग लगा रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के शिमला कहे जाने वाले मैनपाट से आई एक तस्वीर व्यवस्था के दावों की हवा निकाल देती है। ग्राम कुनिया जंगलपारा की रहने वाली सुखमनिया बाई हर महीने अपनी 90 वर्षीय बुजुर्ग सास को पीठ पर लादकर 9 किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हैं। वजह? सिर्फ चंद रुपयों की वृद्धावस्था पेंशन का भौतिक सत्यापन (Physical Verification)।
यह कहानी सिर्फ एक बहू के संघर्ष की नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की प्रशासनिक संवेदनशीलता के आईसीयू (ICU) में होने का सबूत है।
नियमों की बेड़ियाँ या संवेदनहीनता की हद?
मामला मैनपाट के ‘नर्मदापुर सेंट्रल बैंक’ से जुड़ा है। बैंक के नियमों के मुताबिक, पेंशन की राशि तभी जारी होगी जब हितग्राही खुद आकर फिंगरप्रिंट लगाएगा या अपना भौतिक सत्यापन कराएगा।
अब सवाल यह उठता है कि:
क्या 90 साल की एक लाचार वृद्धा, जो ठीक से खड़ी भी नहीं हो सकती, उसके लिए नियम इतने पत्थर दिल होने चाहिए?
क्या तपती धूप में, नदी-नालों और पथरीली पगडंडियों को पार कर एक महिला का अपनी सास को पीठ पर ढोना ‘डिजिटल इंडिया’ की सही तस्वीर है?
एक बड़ा सवाल: सरकारें घर-पहुंच सेवा (Doorstep Banking) और बुजुर्गों के लिए विशेष रियायतों के बड़े-बड़े दावे करती हैं। लेकिन मैनपाट का यह वनांचल क्षेत्र चीख-चीख कर कह रहा है कि ये योजनाएं केवल कागजों तक सीमित हैं





