June 15, 2026 5:06 pm

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क्या लौटेगी घरघोड़ा विधानसभा? इतिहास, वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं पर एक विशेष रिपोर्ट

 

घरघोड़ा, रायगढ़। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक और खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्रों में शामिल घरघोड़ा कभी अपनी अलग विधानसभा पहचान रखता था। वर्ष 1957 से 1972 तक घरघोड़ा एक स्वतंत्र विधानसभा क्षेत्र था, जहां चार विधानसभा चुनाव हुए और चार अलग-अलग विधायक चुने गए। लेकिन वर्ष 1977 के परिसीमन के बाद इस विधानसभा क्षेत्र का विलोपन कर दिया गया और इसका अधिकांश हिस्सा धरमजयगढ़ विधानसभा में शामिल कर दिया गया। आज लगभग पांच दशक बाद एक बार फिर घरघोड़ा विधानसभा की चर्चा क्षेत्र में तेज होने लगी है।

घरघोड़ा विधानसभा का गौरवशाली इतिहास

घरघोड़ा विधानसभा में पहला चुनाव वर्ष 1957 में हुआ था। इसके बाद 1962, 1967 और 1972 में चुनाव संपन्न हुए। इस क्षेत्र की एक विशेषता यह रही कि यहां किसी भी विधायक को लगातार दूसरी बार जनता का समर्थन नहीं मिला।

घरघोड़ा विधानसभा के निर्वाचित विधायक इस प्रकार रहे—

* 1957 – राजा ललित कुमार (कांग्रेस)
* 1962 – बहादुर सिंह (पीएसपी)
* 1967 – भानुप्रताप सिंह (जनसंघ)
* 1972 – सुरेंद्र सिंह (कांग्रेस)

1972 में सुरेंद्र सिंह की जीत के साथ घरघोड़ा विधानसभा का अंतिम चुनाव संपन्न हुआ और 1977 के परिसीमन में यह सीट समाप्त हो गई।

घरघोड़ा विधानसभा की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि यहां किसी भी विधायक को लगातार दूसरी बार जीतने का अवसर नहीं मिला। हर चुनाव में मतदाताओं ने नया जनप्रतिनिधि चुना और सत्ता का संतुलन बदलता रहा।

1957: कांग्रेस के दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला

1957 में घरघोड़ा विधानसभा में कांग्रेस के ही दो उम्मीदवार मैदान में थे। राजा ललित कुमार और गौरी शंकर शास्त्री के बीच हुए मुकाबले में राजा ललित कुमार ने 5,206 मतों के अंतर से जीत दर्ज कर घरघोड़ा के पहले प्रमुख निर्वाचित विधायक बनने का गौरव प्राप्त किया।

1962: बदला नेतृत्व, बदला परिणाम

1962 के चुनाव में कांग्रेस ने राजा ललित कुमार को टिकट न देकर सुरेंद्र कुमार सिंह को उम्मीदवार बनाया। इसका लाभ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) के बहादुर सिंह को मिला, जिन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को 866 वोटों से पराजित कर विधानसभा पहुंचने में सफलता हासिल की।

1967: जनसंघ का उदय

1967 के चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर सुरेंद्र कुमार सिंह के साथ मैदान में उतरी, लेकिन उन्हें तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। जनसंघ के भानुप्रताप सिंह ने पीएसपी के रामप्रसाद को 1,403 मतों से हराकर घरघोड़ा विधानसभा पर कब्जा जमाया।

1972: आखिरी चुनाव और कांग्रेस की वापसी

1972 में घरघोड़ा विधानसभा का चौथा और अंतिम चुनाव हुआ। कांग्रेस प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह ने 16,992 वोट प्राप्त कर जनसंघ के रामप्रसाद को 8,184 मतों के बड़े अंतर से हराया। इसी जीत के साथ सुरेंद्र सिंह घरघोड़ा विधानसभा के अंतिम विधायक बने।

क्यों महत्वपूर्ण है घरघोड़ा क्षेत्र?

घरघोड़ा केवल एक नगर नहीं, बल्कि उत्तर रायगढ़ अंचल की आर्थिक धुरी माना जाता है। यहां विशाल कोयला भंडार, खदानें, औद्योगिक परियोजनाएं, रेलवे विस्तार, ऊर्जा उत्पादन इकाइयां और तेजी से बढ़ता शहरीकरण मौजूद है। तमनार, घरघोड़ा, कुडुमकेला, पूंजीपथरा , बरौद, मिलुपारा , हमीरपुर धौरभाँटा, टेंडा नवापारा, गेरवानी और आसपास के अनेक क्षेत्र भी विधानसभा में आ सकते है और ये प्रदेश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। बड़ी आबादी, व्यापक भौगोलिक क्षेत्र, औद्योगिक गतिविधियों और आदिवासी-अनुसूचित जनजाति बहुल अंचल होने के कारण लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि घरघोड़ा को पुनः स्वतंत्र विधानसभा क्षेत्र का दर्जा मिलना चाहिए ताकि स्थानीय समस्याओं और विकास कार्यों को बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सके।

परिसीमन के बाद बढ़ सकती हैं विधानसभा सीटें

वर्तमान में छत्तीसगढ़ विधानसभा में 90 सीटें हैं। देशभर में प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया को लेकर चर्चा चल रही है। केंद्र स्तर पर परिसीमन संबंधी विधेयक और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने को लेकर नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन की बात सामने आई है। विभिन्न राजनीतिक और संवैधानिक चर्चाओं में यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि भविष्य में राज्यों की विधानसभा सीटों की संख्या में भी वृद्धि हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि छत्तीसगढ़ में सीटों की संख्या 90 से बढ़ती है तो घरघोड़ा जैसे बड़े और प्रभावशाली क्षेत्र को पुनः विधानसभा के रूप में स्थापित करने की मांग और मजबूत हो सकती है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी उठी परिसीमन की चर्चा

हाल ही में छत्तीसगढ़ विधानसभा के विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर चर्चा हुई। परिसीमन के बाद नए निर्वाचन क्षेत्रों के गठन और सीटों के पुनर्गठन की संभावना को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने विचार रखे। इससे यह स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में परिसीमन का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की राजनीति को भी प्रभावित करेगा।

यदि घरघोड़ा विधानसभा बनी तो कौन हो सकते हैं प्रमुख दावेदार?

राजनीतिक गलियारों में अभी से इस बात पर चर्चा होने लगी है कि यदि भविष्य में घरघोड़ा विधानसभा का पुनर्गठन होता है तो प्रमुख राजनीतिक दलों के संभावित चेहरे कौन होंगे।

भाजपा से संभावित नाम

* राधेश्याम राठिया
* सत्यानंद राठिया
* ⁠संतोष राठिया
* अश्वनी पटनायक
* अरुंनधार दीवान
* कैलाश पटनायक
* ⁠जगेश सिदार

कांग्रेस से संभावित नाम

* लालजीत सिंह राठिया
* कुंज बिहारी सिदार
* बिहारी पटेल
* ⁠सुरेंद्र सिदार
* सुरेंद्र चौधरी
* ⁠शिव कुमार
* उस्मान बेग

हालांकि वर्तमान में यह केवल राजनीतिक चर्चाओं और संभावनाओं का विषय है। किसी भी दल द्वारा आधिकारिक रूप से कोई नाम घोषित नहीं किया गया है।

जनभावनाओं से जुड़ा मुद्दा

घरघोड़ा विधानसभा की मांग केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पहचान, प्रशासनिक सुविधा और विकास की अपेक्षाओं से भी जुड़ी हुई है। क्षेत्र के अनेक लोग मानते हैं कि जिस घरघोड़ा ने कभी अपना विधायक चुना था, उसे बदलते समय और बढ़ती आबादी के अनुरूप फिर से विधानसभा का दर्जा मिलना चाहिए।

लगभग 49 वर्ष पहले समाप्त हुई घरघोड़ा विधानसभा आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित है। अब सबकी नजर भविष्य के परिसीमन पर टिकी है, जो तय करेगा कि क्या घरघोड़ा को उसकी पुरानी राजनीतिक पहचान दोबारा मिल पाएगी।

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Author: News Spashat CG