June 10, 2026 6:03 am

ट्रेंडिंग स्टोरी
Advertisement

केलो को ज़हरीला करने वालों को ‘ईनाम’? एनजीटी की रडार पर रही कंपनी को पूर्वांचल में 17 लाख टन के नए मेगा प्लांट की तैयारी

रायगढ़। क्या रायगढ़ की जीवनदायिनी ‘केलो नदी’ को ज़हरीले नाले में तब्दील करने वाले औद्योगिक घरानों को अब प्रशासन की तरफ से नए और विशाल प्लांट ईनाम में बांटे जा रहे हैं? यह तीखा सवाल इस वक्त रायगढ़ के पूर्वांचल के गांवों में गूंज रहा है। पर्यावरण नियमों की सरेआम अनदेखी के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के निशाने पर रही ‘सिंघल स्टील प्राइवेट लिमिटेड’ अब ग्राम पतरापाली (पूर्व), कोतरलिया और सियारपाली की उपजाऊ जमीनों पर 17 लाख टन का विशाल ‘ग्रीनफील्ड इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट’ लगाने जा रही है।
​इस विवादित और विनाशकारी माने जा रहे प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखाने के लिए छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (CECB) ने आगामी 6 जुलाई 2026 को लोक सुनवाई (जनसुनवाई) तय कर दी है। लेकिन इस जनसुनवाई से पहले कंपनी के पुराने काले कारनामों और सरकारी जांच कमेटियों के जो दस्तावेज सामने आए हैं, वे प्रशासन की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
📄 सरकारी रिकॉर्ड: NGT की जांच में खुली ‘सिंघल’ की पोल
​सिंघल एंटरप्राइजेज की कार्यप्रणाली पहले भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के दायरे में रही है। NGT के आधिकारिक दस्तावेजों (O.A. No. 55 of 2021) और CPCB-CECB की जॉइंट कमिटी की रिपोर्ट के निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाले हैं:
​ज़मीन के दावों में भारी हेरफेर: कंपनी ने सरकारी कागजों में 137 हेक्टेयर ज़मीन अपने नाम होने का दावा किया था, लेकिन जांच में यह दावा झूठा निकला। रिकॉर्ड के अनुसार, केवल 74.836 हेक्टेयर (करीब 38%) ज़मीन ही सीधे कंपनी के नाम पर है, बाकी ज़मीन अन्य लोगों के मालिकाना हक में है।
​भूजल (Groundwater) पर मंडराता खतरा: कमिटी ने अपनी सिफारिश में स्पष्ट किया है कि कंपनी को अपने बॉटम ऐश स्टोरेज (राख जमा करने की जगह) के आसपास के भूजल की विस्तृत स्टडी करानी चाहिए, जो सीधे तौर पर जल प्रदूषण के बड़े खतरे को दर्शाता है।
​33% ग्रीन बेल्ट की चोरी: पर्यावरण मंजूरी की सबसे बुनियादी शर्त ’33 प्रतिशत हरित पट्टी (Green Belt)’ का पालन कंपनी नहीं कर रही थी, जिसे लेकर कोर्ट को सख्त निर्देश देने पड़े।
​🔍 जांच के दिन ESP का ‘खेल’ और खराब हाउसकीपिंग
​NGT के आदेश पर जब जॉइंट कमिटी जांच करने पहुंची, तो एक बड़ा तकनीकी विरोधाभास सामने आया। जांच के विशेष दिनों (27-28 अगस्त 2021) को प्लांट से निकलने वाला धुआं (उत्सर्जन) तो तय सीमा में मिला, लेकिन कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में काले अक्षरों में लिखा— “प्लांट के अंदर हाउसकीपिंग (साफ-सफाई) बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं थी।”
​विशेषज्ञों का कहना है: स्पंज आयरन और कोल-बेस्ड पावर प्लांट में यह एक पुराना खेल है। जांच की भनक लगते ही कंपनियां दिखावे के लिए अपने ईएसपी (Electrostatic Precipitator) और प्रदूषण नियंत्रण यंत्र पूरी क्षमता पर चालू कर देती हैं। लेकिन सालों से जमी क्रोनिक डस्ट (कोयले और राखड़ की परत) को रातों-रात साफ नहीं किया जा सकता, जिससे इनकी पोल खुल गई।
​सवाल सीधा है: जो कंपनी जांच की तारीख पता होने के बावजूद अपने परिसर के भीतर बुनियादी साफ-सफाई नहीं रख सकती, वह लाखों टन के नए प्लांट में पतरापाली और कोतरलिया के पर्यावरण और कृषि भूमि के प्रति ईमानदार कैसे रहेगी?
🌊 केलो में घुला जहर, अब पूर्वांचल की बारी

​सिंघल उद्योग पर केलो नदी को प्रदूषित करने के आरोप केवल हवा-हवाई नहीं हैं। तराईमाल (रायगढ़) में कंपनी के पुराने प्लांट की जनसुनवाई (CECB Proceeding Report) के सरकारी दस्तावेजों में ग्रामीणों की यह आपत्ति ऑन-रिकॉर्ड दर्ज है कि— “उद्योग का दूषित पानी केलो में छोड़ा जाएगा। कोयला जलाने से निकलने वाला मर्क्युरी (पारा) हवा और पानी में मिलेगा, जिससे हृदय रोगी बढ़ेंगे।” खुद कंपनी के दस्तावेज मानते हैं कि उसकी जल आपूर्ति का स्रोत ‘छुईकंसा नाला’ है, जो सीधे केलो नदी की सहायक जलधारा है।
🏭 160 MW पावर प्लांट और 17 लाख टन का नया बवंडर
​केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, रायगढ़ पहले से ही देश के ‘गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों’ (Critically Polluted Area) की सूची में है, जहाँ हवा में PM10 का स्तर मानकों से 3 गुना ज्यादा है।
​अब 6 जुलाई को जिस नए प्रोजेक्ट की जनसुनवाई होने जा रही है, उसमें शामिल हैं:
​मुख्य स्टील यूनिट: 17 लाख टन (TPA)
​पेलेट प्लांट: 12 लाख (TPA)
​कोल वाशरी: 6 लाख (TPA)
​कैप्टिव पावर प्लांट: 160 मेगावॉट (MW)
​पूर्वांचल के ग्रामीणों का साफ कहना है कि 100 से ज्यादा उद्योगों के प्रदूषण से उनकी खेती पहले ही चौपट हो चुकी है। इस नए मेगा प्रोजेक्ट से पतरापाली और कोतरलिया की बची-खुची धान और महुआ की किसानी भी दफन हो जाएगी।
📢 हमारा स्टैंड: कागजी औपचारिकता बनकर न रह जाए जनसुनवाई
​’नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’… सिंघल स्टील के इस नए प्रोजेक्ट पर यह मुहावरा एकदम सटीक बैठता है। जो कंपनी ज़मीन के रकबे को लेकर भ्रामक जानकारी दे चुकी हो, जिसकी हाउसकीपिंग कोर्ट की नजरों में खराब हो और जो केलो नदी को प्रदूषित करने के आरोपों से घिरी हो, वह अब ‘ग्रीनफील्ड’ (पर्यावरण अनुकूल) प्रोजेक्ट लगाने का दावा कर रही है।
​प्रशासन और पर्यावरण विभाग (CECB) को 6 जुलाई की जनसुनवाई में जनता के इन तीखे सवालों और ऑन-रिकॉर्ड दस्तावेजों का जवाब देना ही होगा, वरना यह रायगढ़ के पर्यावरण और स्थानीय जनता के साथ एक बड़ा विधिक (Legal) धोखा होगा।

News Spashat CG
Author: News Spashat CG

ताज़ा समाचार
Advertisement
Trending Story