October 29, 2026 6:46 am

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​”सांसों में घुलती राख और फाइलों में ‘स्वच्छ’ रायगढ़: कब रुकेगा पर्यावरण के साथ खिलवाड़?” ​”केलो-महानदी पर राख की परत, जिम्मेदार खामोश: फ्लाई ऐश के आंकड़ों में छिपा है प्रदूषण का राज”

 

​रायगढ़: औद्योगिक जिले रायगढ़ में फ्लाई ऐश प्रबंधन की रिपोर्ट और ज़मीनी हकीकत के बीच विरोधाभास ने बड़े सवालों को जन्म दिया है। अप्रैल 2024 से मार्च 2025 तक की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, जिले के 30 पावर व स्पॉन्ज आयरन प्लांटों ने कुल 1,92,47,423.52 मीट्रिक टन फ्लाई ऐश पैदा की, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि उपयोग का आंकड़ा 1,97,18,330.69 मीट्रिक टन दर्शाया गया है।

​आंकड़ों का खेल:

रिपोर्ट के अनुसार, टीआरएन एनर्जी (151%), सारडा एनर्जी (123%) और लारा सुपर थर्मल (110%) जैसी कंपनियों का ऐश उपयोग 100% से अधिक दिखाया गया है, जो तकनीकी रूप से असंभव प्रतीत होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘माइन फिलिंग’ और ‘रोड मेकिंग’ जैसी श्रेणियों में ऐश को खपाने का दावा किया गया है, जिनकी निगरानी करना सबसे चुनौतीपूर्ण होता है। इन दो श्रेणियों में ही लगभग 1.46 करोड़ टन फ्लाई ऐश का निपटान दिखाया गया है।

​स्थानीय आक्रोश:

कागजों पर शत-प्रतिशत सुरक्षित निपटान के दावे के विपरीत, शहर की सड़कों पर उड़ती काली राख और केलो नदी में बहती प्रदूषण की परत स्थानीय निवासियों के लिए मुसीबत बनी हुई है। पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि इस लापरवाही के कारण कैंसर, सांस और त्वचा संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। प्रशासन की ओर से अब स्वतंत्र थर्ड-पार्टी ऑडिट और फिजिकल वेरिफिकेशन की मांग जोर पकड़ रही है।

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​: रायगढ़ में दम घोंटती राख: नदियों में मिल रही फ्लाई ऐश, रिपोर्ट में है ‘सब ठीक’, हकीकत में प्रदूषित आबोहवा

​रायगढ़: रायगढ़ के लोग एक तरफ औद्योगिक प्रदूषण की मार झेल रहे हैं, तो दूसरी तरफ कागजों पर फ्लाई ऐश प्रबंधन का ‘परफेक्ट’ रिकॉर्ड दिखाया जा रहा है। जिले की ताजा फ्लाई ऐश यूटिलाइजेशन रिपोर्ट में सामने आया है कि उद्योगों ने अपने उत्पादन से कहीं अधिक राख का उपयोग कर लिया है, लेकिन बाहर की दुनिया में हकीकत कुछ और ही है।

​प्रदूषण का ‘काला’ सच:

जिले का सबसे बड़ा उत्पादक ओ.पी. जिंदल थर्मल पावर प्लांट हो या एनटीपीसी की लारा परियोजना, इन सभी का दावा है कि राख का सही प्रबंधन हो रहा है। मगर मानसून के दौरान बहकर नदियों में मिलने वाली राख और खुले में फेंके गए ढेर इन दावों की कलई खोल रहे हैं। रिपोर्ट में ‘कृषि उपयोग’ और ‘ऐश डाइक’ के कॉलम में कोई जानकारी न होना, इस बात का संकेत है कि राख का कोई ठोस प्रबंधन नहीं है।

​क्या है मांग?

जिले के प्रबुद्ध नागरिक और पर्यावरण प्रेमी अब प्रशासन से आर-पार की मांग कर रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और खनिज विभाग से मांग की गई है कि केवल फाइलों को न देखा जाए, बल्कि हर प्लांट का जमीनी सत्यापन (Physical Verification) हो। यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में केलो और महानदी पूरी तरह से राख के गर्त में समा जाएंगे, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होगा।

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Author: News Spashat CG

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