रायगढ़: धरमजयगढ़ के भालूपखना में धनवादा पावर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी द्वारा स्थापित 7.50 मेगावाट की लघु जल विद्युत परियोजना विवादों के घेरे में आ गई है। कंपनी पर गंभीर आरोप है कि उसने वन विभाग, जल संसाधन विभाग और सीएसपीडीसीएल के साथ मिलकर नियमों को बायपास किया है, जिससे मांड नदी का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ गया है और हाथियों के गलियारे (एलिफेंट कॉरिडोर) को भारी खतरा पैदा हो गया है।
नियमों की सरेआम धज्जियां
विवाद का मुख्य केंद्र कंपनी द्वारा बिछाई गई 33 केवी की ट्रांसमिशन लाइन है। आरोप है कि:
- वन भूमि प्रत्यावर्तन (Diversion) का अभाव: कंपनी ने संरक्षित वन क्षेत्र (कम्पार्टमेंट पी-99 और पी-101) में विधिवत वन भूमि प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही बिजली के खंभे और लाइन बिछा दी।
- प्रशासनिक मिलीभगत: सीएसपीडीसीएल ने ‘पुरानी लाइन में सुधार’ के नाम पर निजी कंपनी को लाभ पहुँचाया और वन क्षेत्र में अपने खंभों का उपयोग कर 33 केवी लाइन बिछवाने में मदद की।
- शर्तों का उल्लंघन: तत्कालीन कलेक्टर ने एनओसी देते समय स्पष्ट शर्त रखी थी कि “गैर वानिकी प्रयोजन के लिए भूमि प्रत्यावर्तन अनिवार्य होगा” और मांड नदी को उसके मूल स्वरूप में वापस लाना होगा। हालांकि, न तो भूमि प्रत्यावर्तन हुआ और न ही नदी का संरक्षण किया गया।
मांड नदी का बदला नक्शा, हाथी कॉरिडोर खतरे में
धरमजयगढ़ क्षेत्र हाथियों का स्थाई ठिकाना माना जाता है। पर्यावरणविदों के अनुसार, यहाँ सुरक्षा नियमों को नजरअंदाज कर काम किया गया है। दूसरी ओर, जल संसाधन विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। मांड नदी के बीच में भारी निर्माण कार्य किया गया, जिससे नदी का बहाव और स्वरूप दोनों बदल गए हैं। हैरानी की बात यह है कि पीसीसीएफ (PCCF) की गंभीर आपत्तियों के बावजूद प्लांट का काम निरंतर जारी रहा।
राजनीतिक गलियारों में गरमाया मामला
स्थानीय विधायक जनप्रतिनिधियों और नेताओं ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने का ऐलान किया है। कंपनी के तेलंगाना आधारित होने और प्रशासनिक अधिकारियों के मौन पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
- उमेश: “यह मामला बेहद गंभीर है, इसे सरकार के समक्ष रखा जाएगा।”
- विद्यावती: “सरकार जंगलों को उजाड़ने का काम कर रही है, कंपनियों को मनमानी की छूट दी जा रही है।”
- उत्तरी: “संरक्षित वन क्षेत्र में टावर लगाना नियम विरुद्ध है, विभागों की मिलीभगत स्पष्ट है।”
- कविता: “प्राइवेट कंपनियों के लिए पर्यावरण के नियमों को तोड़ा जा रहा है, दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।”
- हृदयराम: “मांड नदी और जंगल को उजाड़ने की अनुमति देना घातक है, हम इसके खिलाफ आवाज उठाएंगे।”
जांच और नोटिस के बावजूद काम जारी
साल 2024 में रेंजर और एसडीएम धरमजयगढ़ द्वारा कंपनी के प्रतिनिधियों (हरि असैया और सुनील चौधरी) को नोटिस जारी किया गया था। नियमानुसार, नोटिस मिलने के बाद काम को तत्काल रुक जाना चाहिए था, लेकिन प्रशासनिक शिथिलता के कारण निर्माण कार्य अनवरत जारी रहा।
अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तंत्र इस पर्यावरणीय क्षति के लिए जवाबदेही तय करेगा, या फिर ‘धनवादा पावर’ के हित में पर्यावरणीय कानूनों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाएगा?





