- देउरमार-बोजिया मार्ग पर वन विभाग का ‘अदृश्य’ चेहरा: हाथी सड़क तक पहुंच गए, पर अमला सोता रहा!
रायगढ़: छाल वन परिक्षेत्र के देउरमार-बोजिया मार्ग पर हाथियों के झुंड के सामने ग्रामीणों की जान जोखिम में पड़ने की घटना ने वन विभाग के दावों की पोल खोल दी है। विभाग अब कानून का डर दिखाकर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ने में जुटा है, लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर हाथियों का झुंड रिहायशी इलाके या सड़क तक पहुंचा कैसे?
क्या हाथियों का प्रबंधन सिर्फ ‘नोटिस’ तक सीमित है?
जब भी ऐसी कोई डरावनी स्थिति पैदा होती है, वन विभाग का एकमात्र हथियार ‘जनता को चेतावनी’ देना होता है। विशेषज्ञों और स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग की ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (Early Warning System) पूरी तरह विफल है। हाथी रिहायशी इलाकों के इतने करीब आ जाते हैं, लेकिन वन विभाग की टीम को भनक तक नहीं लगती।
जिम्मेदारी से भागता तंत्र
क्षेत्र में लगातार हो रही हाथी-मानव मुठभेड़ की घटनाओं के बावजूद, वन विभाग के अधिकारी मौके पर समय रहते कभी दिखाई नहीं देते। सवाल यह है:
- ट्रैकिंग टीम कहाँ है? हाथियों के झुंड की लोकेशन ट्रैक करने के लिए तैनात ‘गजराज टीम’ या वन अमला उस वक्त क्या कर रहा था जब झुंड सड़क पार कर रहा था?
- सुरक्षा के इंतज़ाम कहाँ हैं? अगर ग्रामीणों ने लापरवाही की, तो वन विभाग ने समय रहते सड़क को सील क्यों नहीं किया? क्या वन विभाग का काम सिर्फ दुर्घटना के बाद एफआईआर की धमकी देना रह गया है?
- बजट का उपयोग कहाँ हो रहा है? वन्यजीव संरक्षण और हाथी प्रबंधन के नाम पर आने वाला भारी-भरकम बजट क्या सिर्फ कागजों पर खर्च हो रहा है?
जनता को ढाल बनाकर अपनी नाकामी छिपाना
वन विभाग द्वारा ग्रामीणों पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना, अपनी विफलता को छिपाने का एक पुराना हथकंडा है। हकीकत यह है कि जब विभाग हाथियों के सुरक्षित गलियारे (Corridor) को सुरक्षित करने और उन्हें आबादी से दूर रखने में नाकाम रहता है, तो आम लोग भय के साये में जीने को मजबूर होते हैं।
ग्रामीणों का आक्रोश जायज है—जब वन विभाग का सुरक्षा कवच नदारद है, तो जनता कब तक अपनी जान जोखिम में डालकर विभाग की लापरवाही की कीमत चुकाती रहेगी? अब समय आ गया है कि विभाग अपनी नाकामी का ठीकरा जनता पर फोड़ने के बजाय, अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करे और धरातल पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करे।





