रायगढ़/छत्तीसगढ़ शहरों की तर्ज पर अब देश और प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भी स्थानीय स्तर पर कर (टैक्स) वसूली की सुगबुगाहट तेज हो गई है। केंद्र सरकार के निर्देशों और केंद्रीय वित्त आयोग की नई शर्तों के बाद अब ग्राम पंचायतों को अपने वित्तीय संसाधनों (Own Source Revenue) को मजबूत करने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे। इस बदलाव के तहत आने वाले दिनों में गांवों में भी संपत्ति, पानी, सफाई और प्रकाश कर (स्ट्रीट लाइट) जैसे शुल्क वसूले जाने की तैयारी है।
यह पूरा मामला तीन दशक पुराने उस कानूनी प्रावधान से जुड़ा है, जो अब तक कागजों तक सीमित था।
क्या है पृष्ठभूमि? (1992 का कानून और वर्तमान स्थिति)
संसद ने साल 1992 में 73वां संविधान संशोधन पारित किया था, जिसके अनुच्छेद 243H के तहत ग्राम पंचायतों को कर लगाने, वसूलने और खर्च करने का अधिकार दिया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना था।
हालांकि, छत्तीसगढ़ समेत देश के अधिकांश राज्यों में राजनीतिक और सामाजिक कारणों से इस पर अमल नहीं हो पाया। पंचायतें चुनाव के दौरान ग्रामीणों की नाराजगी के डर से टैक्स वसूली से बचती रहीं। नतीजतन, गांवों का पूरा विकास कार्य—चाहे वह नाली निर्माण हो, सड़क हो या पेयजल आपूर्ति—पूरी तरह से केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाले अनुदान पर निर्भर रहा।
अब अचानक क्यों हो रही है सख्ती?
स्थिति में बदलाव तब आया जब 15वें वित्त आयोग ने एक कड़ा नियम लागू किया। इसके तहत यह अनिवार्य कर दिया गया कि जो पंचायतें अपना आंतरिक राजस्व नहीं बढ़ाएंगी, उन्हें आगामी बुनियादी विकास अनुदान (Basic Grants) की किस्त नहीं दी जाएगी।
सरकार और प्रशासनिक विशेषज्ञों का तर्क है कि जब शहरी निकाय पानी और सफाई के लिए यूजर चार्ज ले सकते हैं, तो पंचायतों को भी अपनी बुनियादी सेवाओं के रखरखाव के लिए इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए ताकि वे फंड के लिए हमेशा उच्च स्तर पर निर्भर न रहें।
गांव में क्या-क्या और कैसे बदलेगा?
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत पंचायतों द्वारा निम्नलिखित कर और शुल्क लगाए जाने की रूपरेखा है:
- संपत्ति कर (Property Tax): गांव में एक मंजिल से ऊपर बने पक्के मकान, व्यावसायिक भवनों और दुकानों पर सालाना कर।
- जल कर (Water Tax): घरों में लगे नल कनेक्शन, सामुदायिक पेयजल योजनाओं या पाइपलाइन के उपयोग के लिए मासिक या त्रैमासिक शुल्क।
- सफाई शुल्क (Sanitation Fee): घर-घर कचरा संग्रहण, कचरा वाहन और डंपिंग यार्ड के प्रबंधन के लिए।
- प्रकाश कर (Lighting Tax): सार्वजनिक स्थानों पर लगी स्ट्रीट लाइट, हाईमास्ट और सामुदायिक भवनों की बिजली व्यवस्था के रखरखाव के वास्ते।
फिलहाल दरें तय नहीं की गई हैं। राज्य सरकारों के मार्गदर्शन में प्रत्येक पंचायत अपनी स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार न्यूनतम शुल्क निर्धारित करेगी। आगामी महीनों में प्रस्ताव पास कर इसे अमलीजामा पहनाने की प्रक्रिया शुरू होगी।
राजनीति गरमाई: एनएसयूआई युवा नेता आदित्य दासे का तीखा प्रहार
इस नीति के सामने आते ही राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। एनएसयूआई युवा नेता आदित्य दासे ने इस फैसले पर तीखा सवाल उठाते हुए सरकार को आड़े हाथों लिया है।
“ग्राम पंचायतों को भी अब कर देना होगा। आज़ादी के 75 साल बाद, क्या यही अच्छे दिन हैं?” — आदित्य दासे, एनएसयूआई युवा नेता
एनएसयूआई युवा नेता आदित्य दासे ने सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए तीन मुख्य सवाल उठाए हैं:
- क्या ग्रामीण इलाकों में प्रधानमंत्री आवास जैसी योजनाओं से बढ़े पक्के मकानों की संख्या को देखकर अब ग्रामीणों की जेब पर डाका डालने की तैयारी की जा रही है?
- क्या बड़ी कल्याणकारी योजनाओं के लिए संसाधन जुटाने के एवज में सीधे तौर पर आम ग्रामीणों को निशाना बनाया जा रहा है?
- सरकार पहले गांवों में 24 घंटे पानी, सफाई और बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करे, उसके बाद ही किसी तरह का कर या शुल्क वसूले।
ग्रामीणों की प्रतिक्रिया और अन्य राजनीतिक तर्क
- ग्रामीणों का पक्ष: ग्रामीण इसे “दोहरी मार” मान रहे हैं। उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई और कृषि लागत के बीच यदि हर महीने पानी और संपत्ति का बिल चुकाना पड़ा, तो आम आदमी की कमर टूट जाएगी। महिलाओं का सबसे बड़ा सवाल सफाई शुल्क को लेकर है, जिनका तर्क है कि जब तक हर गली से नियमित रूप से कचरा गाड़ी नहीं निकलेगी, तब तक शुल्क देना पूरी तरह से अन्याय है।
- समर्थन में दृष्टिकोण: दूसरी ओर, कुछ युवा जनप्रतिनिधियों का मानना है कि यदि पंचायतों के पास अपना खुद का फंड होगा, तो छोटे-मोटे विकास कार्यों और बुनियादी मरम्मत के लिए विधायक या सांसद फंड का महीनों इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
निष्कर्ष और आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय निकायों का वित्तीय रूप से मजबूत होना टिकाऊ विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन इस प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता होनी बेहद जरूरी है। कर के रूप में वसूले जाने वाला एक-एक पैसा कहां खर्च हो रहा है, इसका ब्योरा नियमित रूप से ग्राम सभाओं में रखा जाना चाहिए ताकि जनता का विश्वास बना रहे।
सवाल अब यह नहीं है कि कर प्रणाली लागू होगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या पंचायतें इस व्यवस्था के जरिए गांवों को वास्तव में ‘आत्मनिर्भर’ बना पाएंगी और ग्रामीणों को बदले में बेहतर सुविधाएं दे सकेंगी?





