छत्तीसगढ़/बिलासपुर की न्यायधानी कहे जाने वाले बिलासपुर में मानवता को शर्मसार कर देने वाला एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सिस्टम की कलई खोल कर रख दी है। आपदा प्रबंधन के तहत मिलने वाली सहायता राशि को किस तरह लूट का जरिया बनाया जा सकता है, इसकी बानोगी बिलासपुर का ‘सर्पदंश घोटाला’ है।
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- आंकड़ों का खेल: पिछले 3 सालों में बिलासपुर में 431 ऐसे फर्जी मामले पकड़े गए हैं, जिनमें सामान्य मौत (जैसे एक्सीडेंट या हार्ट अटैक) को कागजों में ‘सांप के काटने’ से हुई मौत बता दिया गया।
- सरकारी खजाने को चपत: इस शातिर खेल के जरिए आपदा कोष से कुल 17 करोड़ 24 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि गटक ली गई।
- ‘डायमंड गैंग’ का नेक्सस: इस पूरे रैकेट का संचालन एक सुनियोजित तरीके से ‘डायमंड गैंग’ द्वारा किया जा रहा था, जिसका मास्टरमाइंड एडवोकेट हीरा खांडेकर था। इस नेक्सस में खाकी (पुलिस), सफेद कोट (डॉक्टर) और काले कोट (वकील) के साथ तहसील के कर्मचारी भी शामिल थे।
भ्रष्टाचार की परतें: CIMS अस्पताल से मुखबिरी शुरू होती थी, मृत शरीर पर कृत्रिम रूप से सांप के दांतों के निशान बनाए जाते थे, फर्जी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार होती थी और अंततः मुआवजे के चेक पर डाका डाला जाता था। इस मामले में पुलिस ने मास्टरमाइंड समेत 17 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि कई डॉक्टर अभी भी फरार हैं।
“सरकारी मुआवजे पर ‘डायमंड गैंग’ का पहरा: मौत किसी भी वजह से हो, फाइलों में सिर्फ ‘सांप’ ही बना कातिल”
गरीबों की मदद के लिए बनाए गए सरकारी नियमों का किस हद तक दुरुपयोग हो सकता है, बिलासपुर का सर्पदंश घोटाला इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है। सरकार सर्पदंश से मरने वाले व्यक्ति के परिवार को 4 लाख रुपये का मुआवजा देती है, ताकि संकट के समय परिवार को संबल मिल सके। लेकिन बिलासपुर में यही मुआवजा भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा हथियार बन गया।
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- गैंग की कार्यप्रणाली:
- (मुखबिरी): CIMS अस्पताल में मौत होते ही पुलिसकर्मी और होमगार्ड मास्टरमाइंड हीरा खांडेकर को सूचना देते थे।
- (लालच और सौदा): गैंग का मुखिया पीड़ित परिवार को पैसों का लालच देकर इस अवैध समझौते में शामिल करता था।
- (फर्जीवाड़ा): डॉक्टर मिलीभगत कर शव पर सांप के काटने के निशान बनाते और फर्जी पीएम रिपोर्ट बनाते थे।
- स्टेप (सरकारी संलिप्तता): तहसील कार्यालय के कर्मचारी घूस लेकर फाइलों को पास करवाते थे और मुआवजे की राशि आते ही बंदरबांट हो जाती थी।
- कानूनी शिकंजा: पुलिस ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए 14 से अधिक ठिकानों पर छापेमारी की है। फर्जी रिपोर्ट तैयार करने वाली एक महिला डॉक्टर, तहसील के तीन कर्मचारियों और कई पुलिसकर्मियों सहित कुल 17 लोगों को सलाखों के पीछे भेज दिया गया है।
- गैंग की कार्यप्रणाली:
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निष्कर्ष: यह घोटाला केवल सरकारी तंत्र की विफलता नहीं है, बल्कि उन परिवारों की नैतिकता पर भी बड़ा सवालिया निशान लगाता है, जिन्होंने चंद रुपयों की खातिर अपनों की मौत का सौदा करने से गुरेज नहीं किया।





